झोपड़ी में कांपती चार ज़िंदगी,सिस्टम के भरोसे बेसहारा परिवार।बीमार पति, दो मासूम बच्चे और सिर पर छत का संकट।
जिला ब्यूरो तबरेज खान
सहसवान,बदायूँ तहसील क्षेत्र के ग्राम भीकमपुर टप्पा जामनी में सरकारी आवास योजनाओं की हकीकत एक बार फिर सवालों के घेरे में है। कड़ाके की सर्दी के बीच गांव की एक जर्जर झोपड़ी में रह रहा एक गरीब परिवार न सिर्फ ठंड से जूझ रहा है, बल्कि जीवन–मरण के संकट से भी सामना कर रहा है।गांव के एक कोने में स्थित इस झोपड़ी में रहने वाली शहाना का पति गंभीर बीमारी से जूझ रहा है बीमारी के कारण वह कोई काम करने की स्थिति में नहीं है। इलाज के अभाव और आर्थिक तंगी ने परिवार की कमर तोड़ दी है। झोपड़ी में शहाना अपने दो मासूम बच्चों के साथ पति की देखभाल करती है। सर्द रातों में न तो पक्की छत है, न ही ठंड से बचाव का कोई साधन।प्रधानमंत्री आवास योजना ग्रामीण के तहत हुए सर्वे में शहाना ने अपना नाम दर्ज कराया गया था। परिवार को उम्मीद थी कि उन्हें भी पक्का मकान मिलेगा लेकिन जब अंतिम सूची जारी हुई तो उनका नाम गायब मिला। आरोप है कि जिन परिवारों के पास पहले से पक्के मकान थे या जिनकी ग्राम प्रधान से नजदीकी थी उन्हें योजना का लाभ दे दिया गया जबकि वास्तविक जरूरतमंद आज भी झोपड़ी में रहने को मजबूर हैं।शहाना का कहना है कि ठंड के कारण बच्चों की हालत बिगड़ रही है और पति की बीमारी लगातार गंभीर होती जा रही है। हर रात यह डर बना रहता है कि कहीं कोई अनहोनी न हो जाए। परिवार ने कई बार संबंधित अधिकारियों और ग्राम प्रधान से शिकायत की, लेकिन अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।शहाना का आरोप है कि आवास योजना में खुलेआम पक्षपात किया गया है और ग्राम प्रधान ने अपने चहेतों को प्राथमिकता दी। जरूरतमंदों की आवाज़ फाइलों और कागज़ों में दबकर रह गई है।यह मामला न केवल एक परिवार की पीड़ा को उजागर करता है बल्कि सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है। सवाल यह है कि क्या प्रशासन और जिम्मेदार अधिकारी ऐसे परिवारों की सुध लेंगे या शाहाना जैसे लोग यूं ही झोपड़ी में ठंड बीमारी और बेबसी के साथ ज़िंदगी गुजारते रहेंगे।

